जनता तो पूछेगी, भगवत कौशिक।नई दिल्ली : किरण चौधरी ने राज्यसभा में देश में दवाइयों की अनियंत्रित कीमतों और उससे आम मरीजों पर पड़ रहे आर्थिक बोझ का मुद्दा गंभीरता से उठाया। उन्होंने कहा कि दवाइयों की बढ़ती कीमतें आम नागरिकों के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही हैं और महंगी दवाइयां गरीब व मध्यम वर्ग के मरीजों की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं।
सदन में बोलते हुए उन्होंने कहा कि कई दवाइयों की निर्माण लागत केवल कुछ पैसे या कुछ रुपये प्रति गोली होती है, जबकि वही दवाइयां बाजार में 30 से 35 रुपये प्रति गोली तक बेची जा रही हैं। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार दवाइयों की वास्तविक लागत और मुद्रित अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के बीच का अंतर 50 से 350 गुना तक पाया गया है, जो दवा मूल्य निर्धारण प्रणाली में गंभीर असंतुलन को दर्शाता है।
उन्होंने यह भी कहा कि डॉक्टरों को जेनेरिक दवाइयां लिखने के लिए बाध्य करने पर चर्चा चल रही है, लेकिन केवल यह कदम पर्याप्त नहीं होगा। जब तक जेनेरिक दवाइयों के एमआरपी पर भी प्रभावी नियंत्रण नहीं किया जाएगा, तब तक मरीजों को वास्तविक लाभ नहीं मिल पाएगा।
उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि कई मामलों में ब्रांडेड और जेनेरिक दवाइयों की कीमतों में 200 गुना तक का अंतर पाया गया है। यह स्थिति विशेष रूप से उन दवाइयों में अधिक गंभीर है, जिनकी मांग ज्यादा है।
वजन कम करने की दवाएं जैसे Tirzepatide (मौंजारो), महंगी कैंसर और हृदय रोग की दवाइयां, तथा 300 से 400 रुपये तक कीमत वाले अस्थमा इनहेलर यह दर्शाते हैं कि निर्माण लागत और बाजार कीमत के बीच कितना बड़ा अंतर है। इसके अलावा मधुमेह, दर्द निवारक और संक्रमण से संबंधित दवाइयों में भी इसी प्रकार की कीमत असंगतियां देखने को मिलती हैं।
सांसद ने सरकार से मांग की कि दवाइयों की कीमतों पर सख्त नियमन लागू किया जाए, पारदर्शी मूल्य निर्धारण प्रणाली विकसित की जाए और गुणवत्ता नियंत्रण तंत्र को और मजबूत बनाया जाए, ताकि देश के प्रत्येक नागरिक को सुरक्षित, सस्ती और सुलभ दवाइयां उपलब्ध हो सकें।
इस दौरान उन्होंने यह भी बताया कि मंगलवार को वह राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू द्वारा आयोजित ब्रेकफास्ट कार्यक्रम में भी शामिल हुईं।
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