“सड़क सबकी, तो बोझ सिर्फ आम आदमी पर क्यों? टोल मुक्त गलियारों और विशेषाधिकारों के बीच फंसा लोकतंत्र”

जनता तो पूछेगी,भगवत कौशिक। चंडीगढ़ : देश के बुनियादी ढांचे के विकास में सड़कों और एक्सप्रेसवे की भूमिका धमनियों के समान है। लेकिन इन आधुनिक सड़कों का उपयोग करने के बदले चुकाया जाने वाला ‘टोल टैक्स’ एक बार फिर जनचर्चा और विवाद के केंद्र में है। सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस ने बुनियादी सवाल खड़ा किया है: क्या आम नागरिक पर टोल का बोझ तार्किक है, और क्या कुछ खास वर्गों को दी जाने वाली छूट ‘समानता के अधिकार’ का उल्लंघन नहीं है?

आंकड़ों का आईना: राजस्व और विकास

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के हालिया आंकड़े बताते हैं कि टोल टैक्स अब सरकार के राजस्व का एक बड़ा स्रोत बन चुका है। वित्त वर्ष 2024-25 में कुल टोल वसूली 72,000 करोड़ रुपए के पार पहुंच गई, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 10% अधिक है। चालू वित्त वर्ष (2025-26) की पहली तिमाही में ही फास्टेग के माध्यम से रिकॉर्ड 20,682 करोड़ रुपए का कलेक्शन हुआ है।सरकार का तर्क वाजिब है कि इस राशि का बड़ा हिस्सा राष्ट्रीय राजमार्गों के रखरखाव, ऋण अदायगी और नई परियोजनाओं (जैसे भारतमाला) के वित्तपोषण में खर्च होता है। साथ ही, फास्टेग और अब प्रस्तावित जीपीएस आधारित टोलिंग (जो 2026 तक पूरी तरह लागू होने की राह पर है) ने व्यवस्था में पारदर्शिता लाने और जाम कम करने में मदद की है।

टोल का गणित: जनता की जेब पर प्रहार

राजस्व में बेतहाशा वृद्धि (2014 बनाम 2024):वर्ष 2013-14 में कुल टोल संग्रह लगभग 12,850 करोड़ रुपए था।वर्ष 2023-24 तक यह बढ़कर 64,800 करोड़ रुपए से अधिक हो गया है। यानी पिछले 10 वर्षों में टोल राजस्व में 500% से अधिक की वृद्धि हुई है, जबकि आम आदमी की औसत आय इस अनुपात में नहीं बढ़ी।

छूट बनाम समानता: एक जटिल संतुलन

जनता के बीच असंतोष का मुख्य कारण ‘वीआईपी छूट’ है। वर्तमान में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों, जजों और सशस्त्र बलों सहित लगभग 25 श्रेणियों को टोल शुल्क से छूट प्राप्त है। जहां संवैधानिक पदों और आपातकालीन सेवाओं (एम्बुलेंस, फायर ब्रिगेड) को छूट देना सुरक्षा और प्रोटोकॉल के लिहाज से अनिवार्य प्रतीत होता है, वहीं सांसदों और विधायकों को मिलने वाली यह रियायत अक्सर आलोचना के घेरे में रहती है।आलोचकों का तर्क है कि जब आम जनता पहले से ही वाहनों की खरीद पर रोड टैक्स और ईंधन पर सेस चुका रही है, तो टोल के रूप में यह ‘तीहरी मार’ केवल आम आदमी पर ही क्यों? यदि सड़कों का निर्माण सार्वजनिक धन से हुआ है, तो इसके उपयोग का शुल्क सभी के लिए एक समान क्यों नहीं हो सकता?

सुधार की राह: पारदर्शिता ही समाधान

विशेषज्ञों का मानना है कि इस असंतोष को दूर करने के लिए सरकार को कुछ ठोस कदम उठाने होंगे:

दोहरी कराधान की समीक्षा : संसद की लोक लेखा समिति ने भी हाल ही में सुझाव दिया है कि टोल दरों की समीक्षा की जाए ताकि बढ़ती वाहन संख्या के अनुपात में आम जनता पर प्रति किलोमीटर का बोझ कम हो सके।

रियायती पास का विस्तार : स्थानीय निवासियों (20 किमी के दायरे में) के लिए वर्तमान में 340-350 रूपये का मासिक पास उपलब्ध है, लेकिन इसका लाभ उठाने की प्रक्रिया को और अधिक सरल और डिजिटल बनाने की आवश्यकता है।

आय-व्यय की पारदर्शिता : प्रत्येक टोल प्लाजा पर यह स्पष्ट जानकारी होनी चाहिए कि उस सड़क की निर्माण लागत कितनी थी और अब तक कितना टोल वसूला जा चुका है। ‘रिकवरी’ पूरी होने के बाद टोल दरों को नियमतः कम किया जाना चाहिए।

आंकड़े गवाह हैं कि हम सड़कें नहीं, बल्कि ‘राजस्व के गलियारे’ बना रहे हैं।

यदि सड़कों का निर्माण जनता के ‘रोड टैक्स’ और ‘सेस’ से हुआ है, तो टोल केवल रखरखाव तक सीमित होना चाहिए, मुनाफे के लिए नहीं।”टोल टैक्स केवल राजस्व जुटाने का साधन नहीं, बल्कि एक विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचा प्रदान करने का अनुबंध है। यदि सड़कें सुरक्षित, गड्ढा मुक्त और समय बचाने वाली हैं, तो जनता शुल्क देने में संकोच नहीं करती। हालांकि, लोकतंत्र में ‘विशेषाधिकार’ की संस्कृति जन-असंतोष को जन्म देती है। समय आ गया है कि टोल नीति को अधिक समावेशी और तर्कसंगत बनाया जाए, ताकि विकास का पहिया बिना किसी सामाजिक भेदभाव के घूमता रहे।

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