जनता तो पूछेगी, भगवत कौशिक। चंडीगढ़ : हरियाणा के अभिभावकों के लिए एक बड़ी और जरूरी खबर है। यदि आप अपने बच्चे का दाखिला शैक्षणिक सत्र 2026-27 में पहली कक्षा (Class-1) में कराने जा रहे हैं, तो उम्र का नया गणित समझना आपके लिए बेहद जरूरी है। हरियाणा सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) को जमीन पर उतारते हुए दाखिले के नियमों में क्रांतिकारी बदलाव कर दिया है।
अब 5 नहीं, 6 साल में शुरू होगी ‘पहली सीढ़ी’
नए नियमों के मुताबिक, अब कक्षा-1 में केवल उन्हीं बच्चों को प्रवेश मिलेगा जिन्होंने 6 वर्ष की आयु पूरी कर ली है। स्कूल शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव विजय सिंह दहिया ने ‘हरियाणा विद्यालय शिक्षा (संशोधन) नियम 2026’ की अधिसूचना जारी कर इस पर मुहर लगा दी है। पहले 5 साल की उम्र में भी दाखिला मिल जाता था, लेकिन अब इस व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया गया है।
30 सितंबर तक की ‘स्पेशल छूट’ – अभिभावकों को बड़ी राहत
सरकार ने नियमों को सख्त तो किया है, लेकिन व्यवहारिक दिक्कतों को देखते हुए एक लचीला विकल्प भी दिया है।
खास प्रावधान: यदि किसी बच्चे की उम्र शैक्षणिक सत्र शुरू होने के समय 6 साल नहीं है, लेकिन वह 30 सितंबर तक 6 वर्ष की आयु पूरी कर लेता है, तो उसे भी कक्षा-1 में दाखिला मिल सकेगा। यह छूट ‘हरियाणा निशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा के अधिकार अधिनियम-2011’ के तहत दी गई है।
तीन चरणों में लागू हुआ यह बदलाव
हरियाणा सरकार ने इस बदलाव को अचानक थोपने के बजाय धीरे-धीरे लागू किया है ताकि स्कूलों और अभिभावकों को तालमेल बिठाने का समय मिले:
- सत्र 2024-25: न्यूनतम आयु 5 वर्ष थी।
- सत्र 2025-26: उम्र सीमा बढ़ाकर 5.5 वर्ष की गई।
- सत्र 2026-27: अब इसे पूर्ण रूप से 6 वर्ष अनिवार्य कर दिया गया है।
क्यों लिया गया यह फैसला?
इस बदलाव के पीछे सरकार का तर्क शिक्षा की गुणवत्ता और बच्चों का मानसिक विकास है।
- NEP 2020 का पालन: पूरे देश में शिक्षा के स्तर को एक समान बनाना।
- मानसिक परिपक्वता: विशेषज्ञों का मानना है कि 6 वर्ष की आयु में बच्चा औपचारिक स्कूली शिक्षा के लिए अधिक तैयार होता है।
- समानता: आयु के अनुसार कक्षा में बच्चों के बीच समानता बनी रहेगी, जिससे सीखने की प्रक्रिया (Learning Outcome) बेहतर होगी।
अभिभावक क्या करें?
अगर आपका बच्चा इस साल 6 साल का नहीं हो रहा है (और 30 सितंबर तक भी नहीं होगा), तो उसे प्री-प्राइमरी (KG/Nursery) में एक अतिरिक्त साल बिताना होगा। विशेषज्ञों की सलाह है कि दाखिले की जल्दबाजी में बच्चों पर मानसिक दबाव न डालें और नए नियमों के अनुसार ही उनके भविष्य की योजना बनाएं।
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