जनता तो पूछेगी, भगवत कौशिक।भिवानी : : “दवा नहीं, केवल दुवा मांगिए!” हरियाणा के भिवानी स्थित चौधरी बंसीलाल सामान्य अस्पताल के आयुर्वेदिक विभाग की हकीकत कुछ ऐसी ही है। सरकार ‘आयुष’ और ‘समग्र स्वास्थ्य’ के विज्ञापनों पर करोड़ों फूँक रही है, लेकिन धरातल पर यह अस्पताल अब ‘इलाज केंद्र’ नहीं बल्कि ‘रेफरल काउंटर’ बनकर रह गया है। 24 मार्च को मीडिया में पोल खुलने के बावजूद 28 मार्च तक प्रशासन की ‘कुंभकर्णी नींद’ नहीं टूटी है।
सर्जिकल स्ट्राइक: कागजों पर ‘सुसज्जित’, हकीकत में ‘शून्य’
अस्पताल की ओपीडी में डॉक्टर तो हैं, लेकिन उनके हाथ में केवल ‘पर्ची’ लिखने की ताकत बची है। विभाग की अलमारियां सफेद हाथी की तरह खड़ी हैं। 90% आवश्यक दवाइयां स्टॉक से नदारद हैं।
गायब दवाओं का ‘ब्लैक होल’:
- चूर्ण: त्रिफला, सितोपलादि, तालिसादि, सोमलता और स्वर्ण गैरिक (पाचन और श्वसन के लिए अनिवार्य)।
- सिरप: दशमूलारिष्ट, कुमारी आसव, द्राक्षसव और जी-लिव (आते ही गायब होने का रहस्यमयी खेल)।
- वटी (गोलियां): संशमनी, संजीवनी, त्रिफला गुग्गुलु और कांचनार गुग्गुलु।
- तेल व क्रीम: सोमराजी तैल, धनवंतर तैल और फिसिलैक्स क्रीम।
बड़ा सवाल: बजट जा कहाँ रहा है? (Financial Anomaly?)
जब महानिदेशक आयुष, स्वास्थ्य मंत्री और मुख्यमंत्री तक शिकायतें पहुंच चुकी हैं, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? यह ‘प्रशासनिक मौन’ किसी बड़े वित्तीय घोटाले की ओर इशारा करता है।
विज्ञापनों पर लाखों का खर्च: मंत्री की तस्वीरों वाले चमचमाते बैनरों के लिए पैसा है, पर त्रिफला चूर्ण के लिए नहीं?
लॉजिस्टिक घोटाला: क्या दवाइयां सप्लाई चेन में ही गायब की जा रही हैं या लोकल परचेज के नाम पर बंदरबांट हो रही है?
व्यवस्था का ‘अंधेर नगरी-चौपट राजा’ मॉडल
बिल्डिंग का खेल: नई आयुर्वेदिक बिल्डिंग तैयार है, लेकिन ओपीडी आज भी पुरानी जर्जर बिल्डिंग से चल रही है। मरीजों को फुटबाल बना दिया गया है।
योग या ‘पार्ट टाइम’ पिकनिक? योग शिक्षकों का दोपहर बाद गायब रहना यह बताता है कि हाजिरी रजिस्टर तो भर रहे हैं, पर सेवाएं नदारद हैं।
मजबूर मरीज: गरीब मरीज अस्पताल इसलिए आता है कि मुफ्त दवा मिलेगी, लेकिन उसे ₹500 का पर्चा थमाकर बाहर के मेडिकल स्टोर पर भेज दिया जाता है।
कानूनी घेरे में प्रशासन: अब जवाब देना होगा!
यह मामला अब केवल समाचार तक सीमित नहीं रहेगा। कानूनी जानकारों के अनुसार:
Consumer Protection Act: सरकारी सेवाओं में इस स्तर की कमी ‘Deficiency in Service’ के दायरे में आती है।
Public Trust Doctrine: लोकसेवक अपने कर्तव्य के निर्वहन में विफल रहे हैं, जो सीधे तौर पर सेवा नियमों का उल्लंघन है।
PIL की सुगबुगाहट: सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अब इस ‘सिस्टम की विफलता’ के खिलाफ उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर ली है।
न्यूज़ व्यू: डबल इंजन या ‘खटारा’ सिस्टम?
सरकार का ‘डबल इंजन’ विकास का दावा भिवानी के इस अस्पताल की दहलीज पर आकर दम तोड़ देता है। अगर अस्पताल में दवा नहीं है, तो उसे ‘अस्पताल’ कहना बंद कर देना चाहिए। जनता को भ्रम में रखना बंद करें—या तो अलमारियां भरें, या इन सफेद हाथियों पर ताला जड़ दें!
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