PMFBY Scam: हरियाणा के किसान को 3.5 एकड़ फसल नुकसान पर मिला 235 रूपये का क्लेम,HDFC ERGO और सरकार के दावों की खुली पोल

67 रूपये प्रति एकड़ : क्या यही है किसान की आय दोगुनी करने का सच? हिसार में PMFBY के नाम पर किसान को थमाई चवन्नी!

जनता तो पूछेगी , भगवत कौशिक। हिसार/चंडीगढ़ : देश में जहाँ ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘किसान की आय दोगुनी’ करने के नारे दीवारों पर चमक रहे हैं, वहीं हरियाणा के हिसार जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो व्यवस्था के खोखलेपन को चीख-चीख कर बयां कर रही है। किरतान गांव के एक साधारण किसान सुरेंद्र शर्मा के लिए सरकारी ‘सुरक्षा कवच’ (बीमा) किसी मानसिक प्रताड़ना से कम साबित नहीं हुआ।

गणित जो शर्मसार कर दे: ₹67 में एक एकड़ का ‘सौदा’

किसान सुरेंद्र शर्मा ने अपनी 3.5 एकड़ भूमि पर खून-पसीना एक कर खरीफ 2025 की फसल बोई थी। कुदरत की मार और फसल बर्बादी के बाद, जब सरकारी दावों के मुताबिक HDFC ERGO बीमा कंपनी से मुआवजे की बारी आई, तो उनके बैंक खाते में मात्र ₹235.18 जमा किए गए।

​अगर आंकड़ों का विश्लेषण करें, तो बीमा कंपनी और कृषि मंत्रालय की नजर में किसान की एक एकड़ फसल की कीमत मात्र ₹67.15 लगाई गई है। यह राशि इतनी कम है कि किसान के बैंक तक जाने का किराया भी इससे कहीं अधिक होगा।

“यह मुआवजा नहीं, यह उस अन्नदाता की बेइज्जती है जो पूरे देश का पेट भरता है। क्या ₹67 में आज के दौर में एक वक्त की थाली भी आती है? फिर एक एकड़ की मेहनत का यह सिला क्यों?”JPH News Editorial

बीमा कंपनियों की ‘चालाकी’ या प्रशासनिक अंधेरगर्दी?

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के तहत किसानों से हर साल प्रीमियम के नाम पर करोड़ों रुपये वसूले जाते हैं। लेकिन जब मुआवजे की बात आती है, तो जटिल नियमों, सर्वे की खामियों और तकनीकी ‘ग्लिच’ का हवाला देकर ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर राशि थमा दी जाती है।

मुख्य सवाल जो सत्ता से पूछे जाने चाहिए:

  1. प्रीमियम बनाम क्लेम: किसान से वसूले गए प्रीमियम और दिए गए ₹235 के मुआवजे के बीच का अंतर कितना न्यायपूर्ण है?
  2. सर्वे की विश्वसनीयता: किस आधार पर 3.5 एकड़ के नुकसान का आकलन महज ₹235 किया गया?
  3. जवाबदेही किसकी?: क्या कृषि मंत्री और बीमा कंपनी के आला अधिकारी इस ‘भद्दे मजाक’ की जिम्मेदारी लेंगे?

सोशल मीडिया पर फूट रहा है गुस्सा

​सुरेंद्र शर्मा को मिले इस ‘भारी-भरकम’ मुआवजे का स्क्रीनशॉट अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। किसान संगठनों ने इसे ‘कॉर्पोरेट लूट’ करार दिया है। स्थानीय किसानों का कहना है कि अगर सरकार समय रहते नहीं जागी, तो यह ₹235 का मुद्दा आने वाले चुनावों में सरकार के लिए ‘महंगा’ साबित हो सकता है।

सरकारी आंकड़ों की पोल खोलता ‘जहरीला’ सच:

​जहाँ सरकार विज्ञापनों पर करोड़ों खर्च कर रही है, वहीं ज़मीनी हकीकत यह है कि किसान को बैंक जाने का किराया भी अपनी जेब से भरना पड़ रहा है। विपक्ष ने सवाल उठाया है कि क्या PMFBY (प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना) अब केवल बीमा कंपनियों की तिजोरियां भरने का जरिया बनकर रह गई है?

ब्यूरो रिपोर्ट: JPH NEWS HARYANA

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