बढ़ती मिलावट, गिरती गुणवत्ता और देश के सामने खड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट

जनता तो पूछेगी भगवत कौशिक।नई दिल्ली : भारत में दूध को सदियों से “संपूर्ण आहार” माना गया है। बच्चों के पोषण से लेकर धार्मिक आस्था तक, दूध भारतीय जीवन का अभिन्न हिस्सा है। दूध पीओ, ताकत पाओ” — भारतीय समाज में यह सिर्फ़ कहावत नहीं, बल्कि जीवनशैली का हिस्सा रहा है।लेकिन आज सवाल उठ रहा है — क्या हम सचमुच दूध पी रहे हैं या धीरे-धीरे ज़हर निगल रहे हैं।हाल के वर्षों में सामने आए सरकारी सर्वेक्षण, वैज्ञानिक अध्ययन और खाद्य सुरक्षा अभियानों ने दूध की गुणवत्ता को लेकर गंभीर चिंताएँ उजागर की हैं। समस्या सिर्फ़ “मिलावट” की नहीं, बल्कि पूरी आपूर्ति श्रृंखला की गुणवत्ता, निगरानी और नैतिकता की है।जांच अभियानों और खाद्य परीक्षणों में बड़ी संख्या में दूध के नमूने गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतर रहे, जिससे यह चिंता गहराने लगी है कि कहीं यह पोषण का स्रोत धीरे-धीरे स्वास्थ्य के लिए खतरा तो नहीं बनता जा रहा।
उत्पादन में विश्व अग्रणी, गुणवत्ता में चुनौती
भारत आज विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है। मांग लगातार बढ़ रही है—शहरीकरण, पैकेज्ड खाद्य पदार्थों और डेयरी उत्पादों की खपत ने दूध की आवश्यकता को कई गुना बढ़ा दिया है।लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि उत्पादन बढ़ाने की इस दौड़ में गुणवत्ता नियंत्रण उतनी तेज़ी से विकसित नहीं हो पाया।कई परीक्षणों में दूध के नमूनों में मिलावट, रासायनिक अवशेष या मानकों से कम पोषण स्तर पाए गए।असंगठित डेयरी क्षेत्र, जहां से देश की बड़ी आबादी दूध प्राप्त करती है, निगरानी से लगभग बाहर है।गांव से शहर तक—में तापमान नियंत्रण, स्वच्छता और परीक्षण की कमी गंभीर समस्या है।
मिलावट का गणित: कम लागत, अधिक मुनाफ़ा
विशेषज्ञ बताते हैं कि दूध में मिलावट का उद्देश्य अक्सर मात्रा बढ़ाना या कृत्रिम रूप से गुणवत्ता दिखाना होता है।अपने मुनाफे के लिए लोग दुध में ऐसे हानिकारक पदार्थ मिला रहे हैं जो आगे चलकर मानव के लिए गंभीर स्वास्थ्य संकट पैदा कर रहे है।कुछ मामलों में पाए जाने वाले तत्व:
स्टार्च या सिंथेटिक पदार्थ — गाढ़ापन बढ़ाने के लिएडिटर्जेंट जैसे रसायन — झाग और सफेदी दिखाने के लिएयूरिया जैसे यौगिक — प्रोटीन की झूठी मात्रा दर्शाने के लिएसंरक्षक रसायन — दूध को लंबे समय तक खराब होने से बचाने के लिए।ये पदार्थ अल्पकालिक लाभ तो देते हैं, लेकिन उपभोक्ता के स्वास्थ्य के साथ गंभीर खिलवाड़ करते हैं।
स्वास्थ्य पर असर: धीमा लेकिन खतरनाक
चिकित्सकों के अनुसार दूषित दूध का असर तुरंत दिखाई नहीं देता, जिससे खतरा और बढ़ जाता है।बच्चों में पाचन संबंधी समस्याएँ, एलर्जी और पोषण असंतुलन,लंबे समय तक सेवन से यकृत, गुर्दे और हृदय पर प्रभाव,एंटीबायोटिक अवशेष से शरीर की दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता कम होना।यानी यह केवल खाद्य सुरक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के स्वास्थ्य से जुड़ा प्रश्न है।
कानून हैं, लेकिन अमल ढीला
खाद्य सुरक्षा नियम मौजूद हैं, पर उनका पालन देशभर में समान रूप से नहीं हो पाता।विशेषज्ञ मानते हैं कि निरीक्षण व्यवस्था अभी भी प्रतिक्रियात्मक है—अर्थात कार्रवाई शिकायत के बाद होती है, रोकथाम पहले नहीं।
भरोसा बचाना सबसे बड़ी चुनौती
दूध केवल एक उत्पाद नहीं, बल्कि भारत की पोषण व्यवस्था की रीढ़ है। यदि इस पर से भरोसा कमजोर होता है, तो उसका असर सीधे बच्चों के स्वास्थ्य, किसानों की आय और खाद्य सुरक्षा पर पड़ेगा।देश ने श्वेत क्रांति से उत्पादन बढ़ाया था।अब समय है — “शुद्धता क्रांति” का।
